Wednesday, July 4, 2007

शुभ-विचार

....जगत में यदि गेस्ट की तरह
रहना आ गया तो समझ लीजिये
मानो पूरा जगत आपका अपनी ही है.

....आप उस दिन वाक़ई समझदार हो जाते
हैं किस दिन आप अपने आपको मूर्ख मानकर
चलते हैं

....क़ामयाबी बेहद मामूली चीज़ है;
वह जीवन का एक पड़ाव तो हो सकती है ;
पूरा जीवन या जीवन लक्ष्य नहीं.वैसे ही जैसे
मुंबई घुमने जा रहे हैं बीच में सूरत स्टेशन आया;
प्लेटफ़ाँर्म पर उतरे ; खाने-पीने की चीज़ें ली और आकर
बैठ गये फ़िर अपनी ट्रेन के डिब्बे में.ऐसा थोडे़ ही है कि
सूरत स्टेशन का बटाटा वड़ा अच्छा लगा तो वहीं बैठ गये.
ऐसा करोगे तो मुंबई कैसे पहुँचेंगे ? कामयाबी सूरत
स्टेशन है...बटाटा वड़ा लिया और चल पडे़ अपनी मंज़िल पर.और फ़िर
मुंबई पहुँचे , अपना काम किया और लौट आए अपने शहर,अपने गाँव ,
अपने घर. तो लौटना तो है ही..
एक समय के बाद बाहर की यात्रा बंद हो जाए..
भीतर की प्रांरभ...

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