Wednesday, August 25, 2010

इस धरती पर कोई भी अमर नहीं है !


मृत्यु एक शाश्वत सत्य है। इस सत्य को हम जितना जल्दी स्वीकार कर लें, उतने ही हम सुखी, शांत और संयमित रहेंगे। धरती पर कोई भी जीवन अमर नहीं है। अमर है तो वह है केवल "परिवर्तन"। बाकी सब नाशवान ही हैं।

मृत्यु एक शाश्वत सत्य है। इस सत्य को हम जितना जल्दी स्वीकार कर लें, उतने ही हम सुखी, शांत और संयमित रहेंगे। धरती पर कोई जीव अमर नहीं है। अमर है तो वह है केवल "परिवर्तन'। बाकी सब नाशवान ही हैं। भगवान ने स्वयं भी जब मनुष्य रूप धरा तो उन्हें भी एक अवधि के उपरांत जाना पड़ा तो हम तो साधारण मनुष्य ही हैं। यह सत्य हम सभी जानते हैं, पर मानते नहीं हैं। इसी कारण अपने झूठे मान-सम्मान, अहंकार और मोह-माया के वशीभूत होकर कभी-कभी जान-बूझकर किसी के दिल को ठेस पहुँचाने वाली बातें भी करते हैं। और तो और, खुद को सही साबित करने के लिए किसी को भी छोटी-छोटी बात में नीचा दिखाकर या किसी का मज़ाक उड़ाकर विजयी मुस्कान भी भरते हैं। कई बार तो गंदी राजनीति करने से भी गुरेज़ नहीं करते। ये सभी तुच्छ कार्य कर हम लोगों के सामने तो गर्व महसूस करते हैं,पर बाद में कई लोगों की अंतरआत्मा उन्हें कचोटती है। अक्सर भावुक लोग गलत व्यवहार करने के उपरांत पछताते भी हैं कि अपने छोटे से अहम को क़ायम रखने के लिए हमने किसी को कितना गिराया या सताया और फिर ऐसे क्रियाकलाप स्वयं उन्हें और सामने वालों को भी रूहानी अशांत और मानसिक अस्थिरता ही देते हैं। "अहम' और "मैं' की इन सभी बुरी आदतों से जो भी भावुक इंसान निजात पाना चाहता है, वह रोज़ सुबह उठकर यह सोच ले कि शायद इस दुनिया में मेरा यह आज आखिरी दिन है। ऐसा दिल से मान लीजिए, फिर देखिए हो सकता है आपके व्यवहार में कुछ अंतर आ जाए। आप शायद कोई भी ऐसा ग़लत कार्य न कर पाएँ, जिससे किसी का दिल दुखे या किसी का अपमान हो। और तो और, हो सकता है कि आप किसी की मदद कर दें, यह सोचकर कि आज तो यह मेरा आखिरी दिन ही है तो क्यों न किसी का भला कर दूँ। इस प्रकार आपका सारा दिन निष्कपट भाव से, सहृदयता से गुज़र जाएगा और फिर रात को सोते समय भगवान को धन्यवाद कहना भी न भूलें कि आज का दिन बहुत शांति और सरलता से बीता। अब आपको नींद भी सुकूनभरी आएगी। फिर अगले दिन सुबह उठकर वही सोच लीजिए। यह दोहराते रहें। हो सकता है इस नकारात्मक भाव से ही आप एक सकारात्मक, सच्चे, हरदिल अज़ीज़ इंसान बन जाएँ, जिसके मन में न कोई छल-कपट है, न किसी प्रकार का कोई पश्चाताप।


-भावना नेवासकर
(भावनाजी एक गृहिणी हैं लेकिन कम्प्यूटर इंजीनियरिंग का अध्ययन भी कर रहीं हैं.मेरे शहर इन्दौर में ही रहतीं हैं. मानवीय मूल्य का उजाला और जीवन-मृत्यु के शाश्वत सत्य को रेखांकित करता ये लेख नईदुनिया रविवारीय में प्रकाशित हुआ. सोचा अपने ब्लॉग मित्रों तक भी यह शब्द-भावना जाना चाहिये.)

3 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छी सीख.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

धरती पर ही नहीं, कहीं भी कोई रूप अमर नहीं। जो पैदा हुआ है वह मरेगा।

arun prakash said...

बहुत प्रतीक्षा कराई आपने नई पोस्ट देने में
आपके लेख प्रेरणा प्रद होते है लेकिन २००७ से २०१० तक लेखो की संख्या घटती जा रही है सक्रियता बढाने का अनुरोध है
आज मै दो वर्षो के बाद आपके ब्लॉग पर आ सका कारण आपके ब्लॉग का पता ब्लॉगर नहीं बता रहा था
सुन्दर लेख के लिए आभार और साधुवाद