Saturday, January 10, 2009

सिर्फ़ कुछ विपरीत होने के डर से कोशिश मत छोडिये.


सात साल का प्यारा सा बच्चा था बंटी। उसके माता-पिता बहुत मेहनत करते, दिन-दिन भर घर से बाहर रहते और थके-हारे शाम को घर लौटते। बंटी भी अपने स्कूल, दोस्तों, पढ़ाई और खेलकूद में खोया रहता।

रविवार की छुट्टी थी। मम्मी पापा सो रहे थे पर बंटी की नींद जल्दी खुल गई। उसके मन में विचार आया कि रोज़ मम्मी मुझे नई-नई चीज़ें बनाकर खिलाती है, पापा मेरा इतना ख्याल रखते हैं, क्यों ना मैं आज उनके लिए कुछ नाश्ता बनाऊँ ? उसके केक बनाने की सोची और बिना शोर किए रसोई घर में जा पहुँचा। उसने एक बर्तन और चम्मच निकाला और कुर्सी खींचकर उस पर चढ़ गया ताकि मैदे का डिब्बा उतार सके। भारी होने से डिब्बा ज़मीन पर गिरा और मैदा सारी रसोई में फैल गया। वह डर गया और जल्दी-जल्दी मैदे को हाथ से समेट कर बर्तन में डालने लगा। बर्तन में मैदा डाल कर, उसमें दूध और शकर मिला कर वह कोशिश करने लगा कि अच्छा सा केक बना कर अपने मम्मी-पापा को ख़ुश कर सके, उन्हें अच्छी तरह खिला सके।

इस कोशिश में उसे निराशा भी हाथ आई और वह ख़ुद पूरा मैदे के घोल से गंदा हो गया। उसे सूझ नहीं पड़ रहा था कि अब क्या करे ? अपने केक को कैसे पकाए क्योंकि उसे तो गैस जलाना या ओवन चालू करना भी नहीं आता था। इतने में ही उसकी बिल्ली बर्तन पर झपटी और घोल को नीचे गिरा दिया। बंटी घबरा कर रोने लगा और अपने कपड़ो से घोल साफ़ करने लगा।

वह कुछ अच्छा करना चाहता था पर सब उल्टा-पुल्टा हो रहा था। तभी उसके पापा वहॉं आ कर उसे देखने लगे। उन्होंने धीरे से आकर अपने रोते हुए बेटे को गोद में उठाया, उसे सीने से लगाया और प्यार से पुचकारने लगे। पापा के कपड़ों पर भी घोल की चिपचिपाहट साफ़ नज़र आ रही थी।

ईश्वर भी हमारे साथ कुछ ऐसा ही करता है। हम जीवन में कुछ अच्छा करना चाहते हैं पर कई बार सारा काम बिगड़ जाता है। शादीशुदा लोगों के दाम्पत्य में कभी चिपचिपाहट हो जाती है और कभी हम किसी दोस्त की बेइ़ज़्ज़ती कर बैठते हैं। कभी हमारी नौकरी ख़तरे में पड़ जाती है तो कभी स्वास्थ्य साथ नहीं देता है। ऐसे में हम आँखों में आँसू भरे चुपचाप खड़े रहते हैं क्योंकि हमें समझ में नहीं आता कि दरअसल हम क्या करें। यही वक़्त होता है जब एक अदृश्य शक्ति जिसे हम ईश्वर या अल्लाह कहते हैं; हमें थामता है और हमें दुलार कर, हमारी भूलों को क्षमा कर खड़े रहने की शक्ति देता है। हमारी सारी गंदगी और चिपचिपाहट ईश्वर स्वयं ले लेता है। सिर्फ़ इस डर से कि हम गंदे हो जाएंगे या अस्त-व्यस्त हो जाएँगे, हम "केक' बनाने की कोशिश नहीं छोड़ सकते। अपनों के लिए हमारी यह कोशिश जारी रहनी चाहिए। कभी न कभी तो हमें सफलता अवश्य ही मिलेगी और तब हमें कम से कम यह संतोष तो रहेगा कि हमने प्रयास किया।

याद यही रखना है कि - 'कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।'


(मेरे आत्मीय श्री एस.नंद के परिपत्र स्वयं उत्थान से साभार )

4 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

यदि भय से नया काम करना छोड़ दें तो ज्ञानार्जन ही ठहर जाएगा।

shelley said...

bahut badhiyan. katha achchhi hai or niti se paripurn.

Dr. G. S. NARANG said...

Apka yeh blog muje bahut priya hai. shri nand sb aur apki yeh rachna achi lagi......par ek baat sochne wali yeh hai ki akhir hum jitna kya chahte hai , kis se jitna chahte hai....dusri baat yeh ki aksar hum us adrasya shakti ki baat karte hai , jiska anubhav shayad kitno ne kiya ho.........

भूतनाथ said...

अरे,.....अरे.....यह मैं कहाँ आ गया....लगा तो था कि मरुभूमि है....लेकिन यहाँ तो नमी-ही-नमी है.....इतनी कि मैं इन शब्दों की नमी से पूर्णं होकर यहाँ से जा रहा हूँ...बेशक जाने का दिल बिल्क्कुल नहीं कर रहा....यह कौन है.....मुझे इस तरह भिगोने वाला.....???
अरे जादू......तो क्या मैं जादू पढ़ रहा था....नहीं..नहीं देख रहा था.....अरे नहीं..नहीं....पढ़ रहा था....अरे नहीं भाई...देख रहा था....अरे...बस...बस...बस....ओह आप ही बताईये ना....कि मैं क्या कर रहा था.....इस तरह मेरी बेचारगी का मज़ा लिए जा रहे हो....!!!!!