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Tuesday, January 20, 2009

आप प्रसन्न हैं तो मालामाल हैं


जीवन की भागम-भाग और अवमूल्यन से भरे समय में प्रसन्नता दुर्लभ होती जा रही है।ज़िन्दगी में सारे तामझाम की उपलब्धता के बावजूद ख़ुशी पाना मुश्किल होता जा रहा है. वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी श्री नरहरि पटेल का यह निबंध बता रहा है कि प्रसन्नता किस तरह से आपके मन के सच्चे वैभव का आलोक रचती है.यह आलेख श्री पटेल की हाल ही में जारी पुस्तक जाने क्या मैंने कही से लिया गया है.


प्रसन्नता आत्मीय गुण है। जो आत्मीय रूप से प्रसन्न है, वही हर्षित-मुख है। प्रसन्नता आंतरिक सकारातमक का द्योतक और आनंद का पयार्यवाची भाव है। देह और इंद्रियॉं जब ब्राह्य रूप से प्रफुल्लित होती हैं, समझो आपके अंतर्मन में ख़ुशी विराजमान है। यह ख़ुशी इंद्रियों द्वारा ख़ासकर मुख द्वारा, हर्ष, उल्लास और उमंग के रूप में प्रसारित होती है। यही आंतरिक प्रसन्नता जब चर-अचर और सर्वआत्माओं में व्याप्त हो जाती है तब वह सर्वकल्याणी होती है और तब प्रकृति के उपादान फल, फूल और ब्राह्य जगत भी ख़ुशबू और बहार से लदे भरपूर नज़र आते हैं। प्रकृति के कण-कण में और पूरे वातावरण में भी रूहानी उल्लास भर जाता है।

आंतरिक प्रसन्नता आत्मा का ऐसा उपहार है, जो प्रत्येक आत्मा को परमात्मा ने मूल गुण के रूप में दिया है और इसीलिए यह विनाशी और वरदानी गुण है। देह और दुनिया से प्राप्त प्रसन्नता विनाशी है। आंतरिक रूहानी प्रसन्नता अविनाशी है। जब यह ख़ुशी औरों में बॅंट जाती है तो सभी के गमों को दूर कर वरदानी सिद्ध हो जाती हे। दरअसल जो लोग निर्भय और निर्दोष हैं, वे सहज ही प्रसन्निचत रहते हैं। निर्विकारी प्रसन्नता उस निर्विकारी बालक अथवा कमल पुष्प के समान होती है, जो ब्राह्य संस्कारों से अछूता विशुद्ध और निर्विकारी होता है। यह निर्विकारी हर्षितमुखता देवी-देवताओं के मुख पर सदैव नाचती रहती है। कहा जाता है प्रसन्नता से बड़ी दौलत नहीं। आपकी आंतरिक ख़ुशी गुम हो गई, समझो आप कंगाल हो गए। चाहे आप कितने ही धनी क्यों न हो। आप प्रसन्न हैं तो मालामाल हैं।

जो हर्षित मुख है, समझो वह छल-छदम से दूर हैं। उससे कोई भी मैत्री करना चाहेगा। विकारी मुख-मुद्रा वालों की ओर कोई रुख करना नहीं चाहेगा। जो प्रसन्न है उसमें सहयोग, सद्भावना और मैत्री का आमंत्रण होगा ही। हर्षित मुख व्यक्ति में एक विशेष अलौकिक आकर्षण और प्रसन्नचित गुण का भाव तैरता रहेगा। ऐसा मुख बिना भौतिक श़ृंगार के अलौकिक आभूषणें से सजा रहेगा। कहते हैं - रूप अंतस में जन्म लेकर आकृति में आ जाता है। जो प्रसन्निचत है, वह प्रश्नचित्त हो ही नहीं सकता। अनिश्चय उससे हमेशा दूर रहेगा। वह निश्चय बुद्धि होगा।

जो हर्षिक मुख है वह व्यर्थ चिंतन से मुक्त है। व्यर्थ चिंतर और व्यर्थ विचार, ईर्ष्या, द्वेष, संशय, निराशा ही हीनभावों को बल देते हैं। समर्थ वही हैं जो हर्षित मुख हैं।

लोभ और मोह प्रसन्नता के दुश्मन हैं। लोभी की कामनाओं और इच्छाओं की कभी पूर्ति नहीं होती और इसीलिए वह सदा असंतुष्ट और अप्रसन्न रहेगा। जो अप्रसन्न है वह औरों की प्रसन्नता में भी दोष ढॅंढेगा। आलसी और प्रमादी कभी प्रसन्न नहीं हो सकते। पुरुषार्थी सदैव प्रसन्न रहते हैं। पुरुषार्थी गुणों का अर्जन कर सदा संतुष्ट और प्रसन्न रहेंगे। वे कभी भी औरों के दोष नहीं देखेंगे। वे कभी किसी की उपलब्धि से ईर्ष्या नहीं करेंगे। वे आत्मा-परमात्मा और अपने सुकर्म में निश्चय रखेंगे। वे सदा ख़ुश रहेंगे और इस परम वाक्य में विश्वास करेंगे कि जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है औरजो होगा वह भी अच्छा ही होगा। जो अप्रसन्न है समझो वह आत्म-रूप में है ही नहीं। वह परमात्मा की अवज्ञा में है। वह क्रूर और विध्वसंक भी बन सकता है अपनी दानवी प्रवृत्तियों से। उसके मुख से मुस्कान हमेशा निष्कासित रहेगी। उसकी हॅंसी विकराल कुटिल औ अट्टहास से भरी होगी। वह तमाम अशांति और विध्वंस का कर्ता और दोषी होगा। उसे औरों की प्रसन्नता की जगह दुःख देना ही अच्छा लगेगा। उसे कौन चाहेगा ? प्रसन्न व्यक्ति सदा सयाने और रहमदिल होंगे। वे आदरणीय भी होंगे। मन,वचन और कर्म से सात्विक गुणों से पूर्ण निष्कामकर्मी और निर्विकारी होंगे। सुख-शांति और आनंद के प्रदाता होंगे और इसीलिए दर्शनीय भी होंगे। प्रसन्नचित्त और हर्षिक मुख बनने के लिए सूक्ष्म अभियान को त्यागें। सच्चे पुरुषार्थी बनें। अपनी अवस्था को अचल, अडोल रखें और व्यर्थ से बचें। परचिंतन और परदर्शन की निगाह खत्म करें। प्रसन्नचित बनकर ख़ुशनसीब बनें। किसी की गलती पर विचार न करें। अनासक्त और सकारात्मक सोच के धनी बनें तो वरदानी बनने से आपको कोई नहीं रोक सकता। प्रसन्नचित्त बनने के लिए पाई-पैसे का कोई खर्च नहीं। घर बैठे प्रसन्नता से ख़ुशी बॉंटे तो यह ख़ुशी पद्मगुणा आपके पास लौटकर आएगी और आप ख़ुशियों के सिंहासन पर विराजित रहेंेगे, चाहे आप फटे टाट पर बैठे होंगे। जो अपने गमों को भुलाकर औरों की प्रसन्नता की चिंता करते हैं, वे चलते-फिरते फरिश्ते हैं।

ग़मों को मुकद्दर की ठोकर न समझो
ये ख़ुशियों के आने का है एक इशारा

Monday, December 29, 2008

हमारी ख़ुशी का रिमोट दूसरों के हाथ में है


सच मानिये ...हमारी ख़ुशी और ग़म का रिमोट कंट्रोल हमारे हाथ में न होकर दूसरे के हाथ में है।
कोई कुछ अच्छा कह देता है तो हम ख़ुश हो जाते हैं; बुरा कह देता है तो हम दुःखी हो जाते हैं .
इस तरह से तो हम किसी और के ग़ुलाम ही हो गए न।
ये रिमोट कंट्रोल हम अपने हाथ में ले लें, तो कोई चाहे कुछ भी कहे, हम सिर्फ़ ख़ुश रहेंगे.
आप कार ख़रीदते हैं, क्योंकि सोचते हैं कि इससे ख़ुशी मिलेगी...
बड़ा मकान ख़रीदते हैं और वहॉं भी यही तमन्ना रखते हैं कि ख़ुशी मिल जाएगी...
लेकिन वह मिलती ही नहीं। इसका कारण साफ़ है कि मकान और कार ख़ुशी नहीं देते।
इनके विज्ञापन में भी आपको बहुत सी सुविधाएँ लिखी मिल जाएंगी, पर ख़ुशी का कहीं ज़िक्र नहीं होगा।
ख़ुशी न तो ऐसी है कि पैसा देकर ख़रीद लिया जाए और न ही ऐसी
कि कोई हमें दे दे, जिससे हम हमेशा के लिए ख़ुश हो जाएँ।

कुछ लोग ये मानकर चलते हैं कि बाहर के लोग या वस्तुएँ
उन्हें ख़ुशी देंगे, इसलिए वे सुबह से शाम तक हाथ फैलाकर ख़ुशी मांगते रहते हैं,
लेकिन जिसके पास वह चीज़ है ही नहीं वह भला कैसे देगा। दरअसल ये ख़ुशी
भीतर से तो है किन्तु वहॉं कोई झॉंकने की कोशिश नहीं करता।
यदि किसी को कोई दुःख पहुँचा दे तो वह सोचता है कि कोई बाहरी व्यक्ति ही आकर
उसे समझाए तब वह समझेगा, लेकिन यदि वह ख़ुद से बात कर ले और समझ ले
तो उस दुःख के दूर होने में एक मिनट का समय भी नहीं लगने वाला.
जब तुम पर कोई ग़ुस्सा करता है तो तुम ग़ुस्से में उसका जवाब मत दो।
दरअसल जो ग़ुस्सा कर रहा है वह उस समय बीमार जैसा है और बीमार से सहानुभूति रखना चाहिए।
यदि हम उसके पर ख़ुद भी ग़ुस्सा हो गए तो फिर हम उसके ग़ुलाम हो गए।
उन्होंने कहा कि ग़ुस्सा और ख़ुशी ऐसे हैं कि दोनों साथ नहीं रह सकते।
यदि ग़ुस्सा है तो ख़ुशी ग़ायब है और ख़ुशी है तो ग़ुस्सा ।



यह ऑप्शन हमारे पास है कि हम ग़ुस्सा करें या ख़ुश रहें...
यदि चाहते हैं ख़ुश रहना तो ग़ुस्सा छोड़ दें, दूसरों के कहे से प्रभावित न हों,
यदि किसी की बात बुरी भी लग जाए तो आप ख़ुद ही अपने को समझाएँ...
दूसरों का इंतज़ार न करें।

Friday, November 14, 2008

किसी के दिल में ख़ुशी की गर्माहट भर दीजिए



स्कूल के पहले ही दिन जब वो पॉंचवी कक्षा के बच्चों के सामने खड़ी थीं, उन्होंने असत्य का सहारा लिया। अन्य शिक्षिकाओं के समान उन्होंने भी बच्चों की ओर देख कर कहा कि वो सभी को समान रूप से प्यार करती थीं जबकि यह संभव नहीं था। कारण था, उनके सामने पहली पंक्ति में अस्त-व्यस्त बैठा, एक छोटा सा लड़का, जिसका नाम टैडी स्टॉडर्ड था।

टीचर श्रीमती थॉम्पसन ने पिछले वर्ष भी टैडी को देखा था और यह पाया था कि वो अन्य बच्चों के साथ घुलता-मिलता था, और उसके कपड़े मैले-कुचले रहते थे और अक्सर यही लगता था कि वो कई दिनों से नहाया नहीं था। इतना ही नहीं, कई बार तो उसका व्यवहार बहुत ख़राब और चिड़चिड़ा होता था। स्थिति यहॉं तक आ पहुँची कि टैडी की नोटबुक में लाल स्याही से काटा-पीटी कर उसे शून्य अंक देने में श्रीमती थॉम्पसन को आनंद की अनुभूति होने लगी। जिस स्कूल में श्रीमती थॉम्पसन पढ़ाती थीं, वहॉं बच्चों का पुराना रेकार्ड देखकर उसकी समीक्षा करनी होती थी, और टैडी की फाइल देखने के लिए उन्होंने अंत तक टालमटोली की और आख़िरकार जब उन्होंने फ़ाइल देखी, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।

टैडी की पहली कक्षा की टीचर ने लिखा था, "टैडी बहुत ही ख़ुशमिजाज़ और होनहार बच्चा है। वो सफ़ाई से काम करता है और अच्छे आचरण वाला है। उसके साथ हमेशा ख़ुशी मिलती है।' दूसरी कक्षा की टीचर ने लिखा, "टैडी एक श्रेष्ठ विद्यार्थी है जिसे सभी सहपाठी पसंद करते हैं। उसकी मॉं गंभीर बीमारी से जूझ रही है, शायद इसीलिए लगता है कि उसके घर की परिस्थिति संघर्षमय होगी।' तीसरी कक्षा की टीचर ने टिप्पणी की, "टैडी अपनी मॉं की मौत से हिल गया है। वह बहुत मेहनत करने की कोशिश करता है परन्तु उसके पिता उसमें दिलचस्पी नहीं लेते। वह बहुत मेहनत करने की कोशिश करता है परन्तु उसके पिता उसमें दिलचस्पी नहीं लेते। उसकी पारिवारिक ज़िंदगी का बुरा असर उस पर पड़ेगा, यदि जल्द ही कुछ कदम नहीं उठाए गए।' चौथी कक्षा की टीचर का कथन था, "टैडी कहीं खो गया है और स्कूल में उसे ख़ास रूचि नहीं रही। उसके कोई दोस्त नहीं हैं और वो कक्षा में सोने लगा है।'

सारी टिप्पणियॉं पढ़कर श्रीमती थॉम्पसन को टैडी की वास्तविक समस्या समझ में आई और उन्हें ख़ुद पर शर्म आने लगी। उनका मन और दुःखी हुआ जब कक्षा के बच्चे उनके लिए क्रिसमस के ख़ूबसूरत तोहफ़े लाए जो रंगबिरंगे काग़ज़ों में लिपटे और आकर्षक रिबन्स से बंधे थे। अपवाद था तो सिर्फ़ टैडी जिसका उपहार एक साधारण से काग़ज़ से ख़राब तरीके से बांधा गया था। श्रीमती थॉम्पसन ने उपहारों के ढ़ेर से टैडी को उपहार सबसे पहले उठाया जिसका भौंडापन देख कक्षा के सभी बच्चे ज़ोर से हॅंसने लगे। उपहार के बक्से में रंगीन पत्थरों का एक हार था जिसके कुछ पत्थर गायब थे। साथ ही पऱफ़्यूम की एक बोतल थी जिसमें एक चौथाई पऱफ़्यूम बचा था। श्रीमती थॉम्पसन ने बच्चों को डॉंट कर चुप किया और कहा कि वो हार वाकई बहुत सुन्दर था। उन्होंने न केवल हार को पहन लिया बल्कि थोड़ा पऱफ़्यूम भी लगाया। उस दिन टैडी स्टॉडर्ड बहुत देर तक स्कूल में रूक कर उस क्षण का इन्तज़ार करता रहा जब उसने अपनी टीचर से कहा, "श्रीमती थॉम्पसन, आज आपमें से मुझे वही ख़ुशबू आई जो मुझे मेरी मॉं के पास से आती थी।' यह सुनने के बाद, जब बच्चे चले गए तो श्रीमती थॉम्पसन फूट-फूट कर रोने लगीं और बहुत देर तक चुप न हो सकीं। उसी दिन से उन्होंने लिखना, पढ़ना, गणित या भूगोल सब छोड़ दिया और ’बच्चों को पढ़ाना' अपना लिया। अब टैडी की ओर उनका विशेष ध्यान रहता।

श्रीमती थॉम्पसन का साथ एवं ध्यान मिला तो टैडी का मस्तिष्क जागृत होने लगा। जितना वो टैडी को प्रोत्साहित करतीं उतना ही वो तीक्ष्ण होता जाता। साल ख़त्म होते-होते टैडी अपनी कक्षा के सबसे मेधावी छात्रों में अव्वल रहने लगा। श्रीमती थॉम्पसन का यह झूठ कि वो सब बच्चों का एक समान चाहती हैं, झूठ ही बना रहा क्योंकि वे टैडी को विशेष रूप से प्यार करती थीं।

एक साल बाद टीचर को टैडी का लिखा एक नोट मिला जिसमें उसने लिखा था कि अपनी पूरी ज़िंदगी में उसे श्रीमती थॉम्पसन से अच्छी टीचर नहीं मिलीं। और छह वर्ष गुज़र गए जब टैडी का ख़त उन्हें मिला। लिखा था कि उसने हाई - स्कूल की परीक्षा तीसरे नंबर पर रहते हुए पास कर ली थी, और श्रीमती थॉम्पसन ही उसके जीवन की सर्वश्रेष्ठ टीचर थीं। इसके चार वर्षों पश्चात टैडी ने अपनी प्यारी टीचर को पुन: लिखा कि उसका जीवन कठिनाईयों में बीता पर उसने पढ़ाई नहीं छोड़ी और वह शीघ्र ही कॉलेज से विशेष योग्यता प्राप्त स्नातक बनने वाला था और अब तक श्रीमती थॉम्पसन से श्रेष्ठ टीचर उसने नहीं देखी। वे सर्वश्रेष्ठ भी थीं और टैडी की सबसे अधिक पसंदीदा टीचर भी। फिर चार वर्ष बीते, और एक पत्र टीचर के नाम। लिखा था कि उसे उपाधि मिल गई थी पर वह और पढ़ना चाहता था। श्रीमती थॉम्पसन से अच्छी कोई टीचर अब भी नहीं थीं।हाँ टैडी के नाम में अब एक अंतर नाम का आ गया था.... अब वह जाना जाता है थियोडोर एफ़.स्टॉडर्ड, एम.डी.; के नाम से.

कहानी यहॉं समाप्त नहीं हुई। एक और पत्र उस वर्ष वसन्त ॠतु में टैडी ने लिखा। यह कि उसे एक लड़की से प्यार हो गया था और उन्होनें शादी करने का फैसला कर लिया है। उसने लिखा कि कुछ समय पूर्व उसके पिताजी की मृत्यु हो गई थी और श्रीमती थॉम्पसन से निवेदन किया कि क्या वो विवाह संस्कार में उसकी मॉं के लिए सुरक्षित स्थान पर बैठ सकती थीं ? निःसंदेह श्रीमती थॉम्पसन टैडी की शादी में सम्मिलित हुईं। विशेष बात यह थी कि समारोह में उन्होनें टैडी द्वारा सालों पूर्व भेंट में दिया रंगीन पत्थरों का हार पहना तथा वो ही पऱफ़्यूम लगाया जिसकी ख़ुशबू टैडी के दिलोदिमाग में बसी थी।

टैडी और श्रीमती थॉम्पसन एक-दूसरे से चिपट गए और टैडी ने उनके कानों में धीरे से कहा, "मुझमें इतना विश्वास दिखाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद, मॉं। इसलिए भी धन्यवाद आपने मुझे मेरा महत्व समझाया और यह हिम्मत दी कि मैं भी जीवन में कुछ कर सकता हूँ।" आँखों से बहती अश्रुधारा के साथ श्रीमती थॉम्पसन बोलीं, "तुम गलत कह रहे हो, टैडी। वह तुम ही थे जिसने मुझे सिखाया कि मैं कुछ बदलाव ला सकती हूँ। जब तक तुमसे नहीं मिली थी, मुझे पढ़ाना आता ही कहॉं था ?


इस प्यारी सी कहानी को पढ़ते-पढ़ते आँखें नम हो जाती हैं।

मित्रों, आज ही किसी के दिल में खुशी की गर्माहट भर दीजिए..... यह संदेश औरों तक पहुँचाइए.... किसी की ज़िंदगी में आज कुछ फ़र्क़ लाइए, कल कुछ बदलाव लाइए। दिल से किए गए उदारता के छोटे-छोटे कार्य जीवन में अमिट छाप छोड़ते हैं।

आपको भी तो मिला है एक उदार दिल !

आपकी जानकारी के लिए विशेष:

-टैडी स्टॉडर्ड डेस्मॉइन्स के आयोवा मेथॉडिस्ट में डॉक्टर हैं जहां पर स्टॉडर्ड कैंसर विंग की स्थापना की गई है।

-यह नीतिकथा प्रसन्नता बाँटने वाले मैनेजमेंट सलाहकार श्री एस.नंद के संस्थान स्वयं उत्थान के परिपत्र से साभार