न जाने क्या बात है कि हमारा मालवा अपनी गुदड़ी के लालों को वह मान देता ही नहीं जिसके वो अधिकारी होते हैं.ऐसे ही एक सु-कवि दिनकर सोनवलकर आज शब्द-सृष्टि की जाजम पर पधारे हैं । सोनवलकरजी ने हिन्दी ग़ज़ल पर भी लाजवाब काम किया है (जिसे नीरज जी गीतिका कहते हैं )मराठी के यशस्वी कवियों के अनुवाद भी सोनवलकरजी ने किये है।कुछ बेहतरीन गीत आकाशवाणी इन्दौर से प्रसारित हुए हैं.दो रचनाएं पढ़िये और महसूस कीजिये इस विलक्षण क़लमकार की कारीगरी को.ये रचनाएं १९७० यानी अब से ३८ बरस पहले हिन्दी की आदरणीय पत्रिका वीणा में प्रकाशित हुईं थीं...
एक सूचना...
कला के इस मंदिर में
झुककर प्रवेश कर.
इसलिये नहीं कि
प्रवेशद्वार छोटा है ?
और तेरी ऊँचाई से
टकरा कर टूट जाएगा .
नहीं !
आकाश ही उसका द्वार है...विराट
यहाँ बौने ही लगेंगे तेरे ठाठ-बाट.
इंसानियत के आगे झुकना
सबसे बडी़ कला है
उन्ही को कर प्रणाम
इसी में छुपे हैं....
रहीम और राम।
परंपरा बोध.....
मुझे क्या ज़रूरत है
विदेशी स्टंटों से चमकृत होने की ?
जिसकी हों अपनी जड़ें,वही औरों के भरोसे जिये.
क्या बताएगा गिन्सबर्ग मुझ कबीर पंथी को ?
पहले कह गया है गुरू हमारा
जो घर फ़ूँके आपनो सो चले हमारे साथ
तुम पहनो अपने तन पर
उधार ली हुई फ़ाँरेनमेड पोषाकें
हम तो जन्म से ही नंगे हैं..नंगे अवधूत
मर्लिन मूनरो या मारिज़ुआना
दोनों हदों से बेहद हो चुके हैं हम .
'हम न मरिहै संसारा'
बीटनिक,बीटल्स या हिप्पी,सभी हैं माया का पसारा.
इस ठगिनी को खू़ब जानते हैं हम .
तुम नये जीवन-दर्शन के नाम पर
बडी़ पुरानी विकृतियों को उछालत हो
रचते रहो आँप या पाँप
हम तो बस चुपचाप
ज्यों की त्यों धर देते हैं चदरिया
विद्रोह को पतिक्षणं जीते हुए !
-दिनकर सोनवलकर
Sunday, April 27, 2008
Tuesday, April 1, 2008
ऐसा लगता है कोई मुझसे बडा है मुझमें… कृष्ण बिहारी नूर की एक उम्दा ग़ज़ल
नूर साहब उर्दू शायरी का एक बडा नाम रहे हैं।
इश्क और मुश्क है ऊपर उठकर अपनी शायरी के ज़रिये
पाठक को एक रूहानी लोक की सैर करवाने वाले इस अज़ीम शायर
की ये लाजवाब ग़ज़ल आपकी नज़्र
आग है पानी है,मिट्टी है,हवा है मुझमें
और फ़िर मानना पडता है ख़ुदा है मुझमें
जितने मौसम हैं,वो सब जैसे कहीं मिल जाएं
इन दिनों कैसे बताऊं जो फ़ज़ाँ है मुझमें
टोक देता है क़दम जब भी ग़लत उठता है
ऐसा लगता है कोई मुझसे बडा है मुझमें
आईना ये तो बताता है मैं क्या हूँ लेकिन
आईना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझमें
इश्क और मुश्क है ऊपर उठकर अपनी शायरी के ज़रिये
पाठक को एक रूहानी लोक की सैर करवाने वाले इस अज़ीम शायर
की ये लाजवाब ग़ज़ल आपकी नज़्र
आग है पानी है,मिट्टी है,हवा है मुझमें
और फ़िर मानना पडता है ख़ुदा है मुझमें
जितने मौसम हैं,वो सब जैसे कहीं मिल जाएं
इन दिनों कैसे बताऊं जो फ़ज़ाँ है मुझमें
टोक देता है क़दम जब भी ग़लत उठता है
ऐसा लगता है कोई मुझसे बडा है मुझमें
आईना ये तो बताता है मैं क्या हूँ लेकिन
आईना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझमें
Monday, March 3, 2008
मानव से क्षुद्र वस्तु की अपेक्षा करना उसका अपमान है !
विश्वकर्मा जब सृष्टि का निर्माण कर चुके तो उन्होने फूल को आदेश दिया...
तू सदैव सौरभ फ़ैलाते रहना।
आकाश में घूमने वाले मेघ से उन्होंने कहा...पवन तेरा रथ है , व्योम-मंडल तेरा विहार-पथ है; पर तेरा काम है प्यासी धरती की प्यास बुझाना।
वृक्ष से उन्होंने कहा...भीषण ग्रीष्म को मस्तक पर सहकर भी तू प्राणियों को सदा छाया देना और तेरे पुष्प तथा फ़ल की सम्पत्ति मानव-समाज को समर्पित करना।
नदी को उन्होंने आदेश दिया ...तू कल-कल स्वर में गाती रहेगी पर तुझे प्यासे प्राणियों की प्यास बुझानी है !
केवल मानव के संबंध में विश्वकर्मा के आदेश विचित्रता से भरे थे...उन्होंने उसे दु:ख दिया ताकि इस दु:ख में से वह सुख के कण खोज निकाले।उसे अंधकार दिया ताकि वह अंधेरे के बीच पथ का निर्माण कर सके।मानव को मृत्यु दी और उससे अपेक्षा की गई कि वह मृत्यु में से अमरताकी राह चुने, असत से सत की राह अपनाए.
यह इतना बड़ा बोझ मानव के ही कंधों पर ही डाला गया क्योंकि वह विश्वकर्मा की श्रेष्ठ कृति है और फ़िर एक वीर से कीड़ा मारने को कहना उसका अपमान ही तो है न ? मानव से क्षुद्र वस्तु की अपेक्षा करना उसका अपमान ही तो होता ! विश्वकर्मा को विश्वास था कि मेरा लाड़ला मनुष्य सब-कुछ कर सकेगा।
(इन्दौर के आध्यात्मिक आस्था केंद्र श्री गीता भवन की स्वर्ण - स्मारिका पर हाल ही में प्रकाशित स्मारिका स्वर्ण - गीत से साभार, इसका रूपांकन मेरे संस्थान एडराग कीक्रिएटिव टीम ने किया है:
www.adraag.com)
तू सदैव सौरभ फ़ैलाते रहना।
आकाश में घूमने वाले मेघ से उन्होंने कहा...पवन तेरा रथ है , व्योम-मंडल तेरा विहार-पथ है; पर तेरा काम है प्यासी धरती की प्यास बुझाना।
वृक्ष से उन्होंने कहा...भीषण ग्रीष्म को मस्तक पर सहकर भी तू प्राणियों को सदा छाया देना और तेरे पुष्प तथा फ़ल की सम्पत्ति मानव-समाज को समर्पित करना।
नदी को उन्होंने आदेश दिया ...तू कल-कल स्वर में गाती रहेगी पर तुझे प्यासे प्राणियों की प्यास बुझानी है !
केवल मानव के संबंध में विश्वकर्मा के आदेश विचित्रता से भरे थे...उन्होंने उसे दु:ख दिया ताकि इस दु:ख में से वह सुख के कण खोज निकाले।उसे अंधकार दिया ताकि वह अंधेरे के बीच पथ का निर्माण कर सके।मानव को मृत्यु दी और उससे अपेक्षा की गई कि वह मृत्यु में से अमरताकी राह चुने, असत से सत की राह अपनाए.
यह इतना बड़ा बोझ मानव के ही कंधों पर ही डाला गया क्योंकि वह विश्वकर्मा की श्रेष्ठ कृति है और फ़िर एक वीर से कीड़ा मारने को कहना उसका अपमान ही तो है न ? मानव से क्षुद्र वस्तु की अपेक्षा करना उसका अपमान ही तो होता ! विश्वकर्मा को विश्वास था कि मेरा लाड़ला मनुष्य सब-कुछ कर सकेगा।
(इन्दौर के आध्यात्मिक आस्था केंद्र श्री गीता भवन की स्वर्ण - स्मारिका पर हाल ही में प्रकाशित स्मारिका स्वर्ण - गीत से साभार, इसका रूपांकन मेरे संस्थान एडराग कीक्रिएटिव टीम ने किया है:
www.adraag.com)
Tuesday, September 18, 2007
अपनी अहमियत न जताएँ...दुनिया आपके बग़ैर भी चलेगी
दुनिया और ज़िन्दगी को एक अनुशासन में लाना ही पड़ता है.पढ़ने और सोचने के बाद यथार्थ से भरे कुछ शब्द ज़हन में उभरे हैं ....आपके साथ बाँट रहा हूँ
- अहंकार को घटाओ...सब कुछ उस ऊपर वाले का बनाया हुआ है....आपका नहीं.
- अपनी अहमियत न जताएँ..कोई है जो इस जगत को बहुत ख़ूबसूरती से संचालित कर रहा है
आपके होने के पहले भी दुनिया थी..... आपके बगै़र भी दुनिया चलेगी.
- पूरे जगत के बारे में सोचें...थोड़ा कम स्वार्थी होकर तो देखिये.
- सादा जीवन बसर करें.निसर्ग को नुकसान न पहुँचाएँ...ये आपका बनाया हुआ नहीं है...आप इसे
बिगाड़ने वाले कौन होते हैं.
- दुनिया को वैसा ही देखिये जैसी वह है...उसे अपने हिसाब से ढ़ालने की कोशिश न करें ; नाक़ाम हो
हो जाएँगे. समय अपने हिसाब से चल रहा है...चलता रहेगा...परिस्थियों के साक्षी बनें..न्यायाधिपति
नहीं.
- आपको लगता है दु:ख आपके हवाले कर दिया गया है; सुख दूसरों के खाते में जमा हो गया है ;
आप ग़लत सोचते हैं. ये तयशुदा फ़िल्म है हुज़ूर बस देखते जाइये...एक क़िरदार बने रहिये..उससे
संघर्ष मत कीजिये.. ज़रा ग़ौर कीजिये आपका दु:ख दूसरों से कम है...इस बात की ख़ुशी तो मनाइये.
- और अंत में.....जान लीजिये कि मृत्यु ही एकमात्र चीज़ है जो सुनिश्चित है..आप सबकुछ अपने
से तय कर सकते हैं बस मृत्यु नहीं...वह सुनिश्चित है ...लेकिन कब ? यह अनिश्चित है.तो जो
सुनिश्चित है वही दैवीय है...उसकी आनंदपूर्वक प्रतीक्षा कीजिये.
- अहंकार को घटाओ...सब कुछ उस ऊपर वाले का बनाया हुआ है....आपका नहीं.
- अपनी अहमियत न जताएँ..कोई है जो इस जगत को बहुत ख़ूबसूरती से संचालित कर रहा है
आपके होने के पहले भी दुनिया थी..... आपके बगै़र भी दुनिया चलेगी.
- पूरे जगत के बारे में सोचें...थोड़ा कम स्वार्थी होकर तो देखिये.
- सादा जीवन बसर करें.निसर्ग को नुकसान न पहुँचाएँ...ये आपका बनाया हुआ नहीं है...आप इसे
बिगाड़ने वाले कौन होते हैं.
- दुनिया को वैसा ही देखिये जैसी वह है...उसे अपने हिसाब से ढ़ालने की कोशिश न करें ; नाक़ाम हो
हो जाएँगे. समय अपने हिसाब से चल रहा है...चलता रहेगा...परिस्थियों के साक्षी बनें..न्यायाधिपति
नहीं.
- आपको लगता है दु:ख आपके हवाले कर दिया गया है; सुख दूसरों के खाते में जमा हो गया है ;
आप ग़लत सोचते हैं. ये तयशुदा फ़िल्म है हुज़ूर बस देखते जाइये...एक क़िरदार बने रहिये..उससे
संघर्ष मत कीजिये.. ज़रा ग़ौर कीजिये आपका दु:ख दूसरों से कम है...इस बात की ख़ुशी तो मनाइये.
- और अंत में.....जान लीजिये कि मृत्यु ही एकमात्र चीज़ है जो सुनिश्चित है..आप सबकुछ अपने
से तय कर सकते हैं बस मृत्यु नहीं...वह सुनिश्चित है ...लेकिन कब ? यह अनिश्चित है.तो जो
सुनिश्चित है वही दैवीय है...उसकी आनंदपूर्वक प्रतीक्षा कीजिये.
Friday, August 24, 2007
आत्मा रूपी रजिस्टर में हमारे सब दोष और दुष्कर्म दर्ज़ हो जाते हैं.

हिन्दी में डाँ कलाम रचित आकर्षक शब्द उपहार....
पूर्व राष्ट्रपति भारतरत्न डाँ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम ने राष्ट्राध्यक्ष से ज़्यादा एक चिंतक के रूप में देशवासियों अधिक मोहा है. हिन्दी में प्रकाशित उनकी पुस्तकों को पाठकों ने शानदार प्रतिसाद दिया है. प्रेरणात्मक विचार नाम से डाँ.कलाम रचित एक आकर्षक शब्द उपहार देखने में आया. 6 X 4 इंच के लगभग आर्ट पेपर के सुन्दर से आवरण से सज्जित पुस्तक में बिना किसी भूमिका के चार पंक्तियों में सुरभित मन को छू लेने वाली सूक्तियाँ संकलित की गईं हैं. राष्ट्र-प्रेम,तकनालाँजी,शिक्षा,सुनहरा भविष्य, समाज,संगीत,बच्चे डाँ कलाम के चिंतन का स्थायी स्वर रहे हैं सो ये सुविचार भी इसी के इर्द-गिर्द हैं.अच्छा मशवरा माननेवालों के लिये बता दूँ कि यह प्रकाशन शुभ-प्रसंगों में भेंट किये जाने वाले 101/- लिफ़ाफ़े से बेहतर है. इसी संकलन से संचय किये गए सुविचारों की बानगी :
- जीवन का महत्व इस बात में है कि खु़द क़ामयाबी हासिल करने से अधिक हम दूसरों को
क़ामयाबी हासिल करने में मददगार हो.
- शिक्षक का जीवन अनेक जीवन को सँवारता है.
- अनदेखे,अनजान रास्तों पर चलने के लिये सदैव तैयार रहना चाहिये.
- हमारा सपना है ऐसे देश का निर्माण ,,जिसमें प्रत्येक देशवासी के चेहरे पर
मधुर मुस्कान हो.
- बचपन में दी गई शिक्षा , संस्कार और नैतिकता किसी काँलेज और यूनिवर्सिटी में मिली
औपचारिक शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण होती है.
- शरीर-रूपी मंदिर को आत्मा - रूपी दीपक ही प्रकाशित करता है.
- आत्मा-रूपी रजिस्टर में हमारे सब दोष और दुष्कर्म दर्ज़ हो जाते हैं.
- नेक और ईमानदार व्यक्ति ही अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकता है.
- लेखक समाज की आत्मा के प्रहरी हैं.
- प्रश्न करते रहिये और उनके उत्तर खोजते रहिये...समय आने पर उत्तर मिलेंगे ही;
और समस्याओं का समाधान भी होगा .
104 पेज का ये शब्द संचयन दो रंगों में बहुत सादा लेकिन सुरूचिपूर्ण तरीक़े से राजपाल एण्ड संस ने प्रकाशित किया है. सारी सूक्तियाँ मन को छूती हैं. प्रत्येक पृष्ठ पर वाँटर मार्क के रूप में कलात्मक चित्र भी हैं जो इन सूक्तियों को पढ़ते वक़्त आँखों को सुकून देते हैं. हिन्दी के प्रसार और प्रचार में भी डाँ.कलाम का यह शब्द संचय महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा क्योंकि छोटी छोटी पंक्तियों में रचे गए ये अग्नि मंत्र वाक़ई प्रेरणास्पद तो हैं ही साथ अंग्रेज़ीदाँ युवा पीढ़ी हमारी राष्ट्र-भाषा की ओर भी ले जाते हैं.हिन्दी मे निश्चित ही ऐसे प्रकाशनों की आवश्यकता है जो उपदेशात्मक न होते हुए आपसे बतियाते हुए नज़र आएँ और पढ़ते ही दिन भर आपके मन-मस्तिष्क में स्पंदित होते रहें.
पूर्व राष्ट्रपति भारतरत्न डाँ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम ने राष्ट्राध्यक्ष से ज़्यादा एक चिंतक के रूप में देशवासियों अधिक मोहा है. हिन्दी में प्रकाशित उनकी पुस्तकों को पाठकों ने शानदार प्रतिसाद दिया है. प्रेरणात्मक विचार नाम से डाँ.कलाम रचित एक आकर्षक शब्द उपहार देखने में आया. 6 X 4 इंच के लगभग आर्ट पेपर के सुन्दर से आवरण से सज्जित पुस्तक में बिना किसी भूमिका के चार पंक्तियों में सुरभित मन को छू लेने वाली सूक्तियाँ संकलित की गईं हैं. राष्ट्र-प्रेम,तकनालाँजी,शिक्षा,सुनहरा भविष्य, समाज,संगीत,बच्चे डाँ कलाम के चिंतन का स्थायी स्वर रहे हैं सो ये सुविचार भी इसी के इर्द-गिर्द हैं.अच्छा मशवरा माननेवालों के लिये बता दूँ कि यह प्रकाशन शुभ-प्रसंगों में भेंट किये जाने वाले 101/- लिफ़ाफ़े से बेहतर है. इसी संकलन से संचय किये गए सुविचारों की बानगी :
- जीवन का महत्व इस बात में है कि खु़द क़ामयाबी हासिल करने से अधिक हम दूसरों को
क़ामयाबी हासिल करने में मददगार हो.
- शिक्षक का जीवन अनेक जीवन को सँवारता है.
- अनदेखे,अनजान रास्तों पर चलने के लिये सदैव तैयार रहना चाहिये.
- हमारा सपना है ऐसे देश का निर्माण ,,जिसमें प्रत्येक देशवासी के चेहरे पर
मधुर मुस्कान हो.
- बचपन में दी गई शिक्षा , संस्कार और नैतिकता किसी काँलेज और यूनिवर्सिटी में मिली
औपचारिक शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण होती है.
- शरीर-रूपी मंदिर को आत्मा - रूपी दीपक ही प्रकाशित करता है.
- आत्मा-रूपी रजिस्टर में हमारे सब दोष और दुष्कर्म दर्ज़ हो जाते हैं.
- नेक और ईमानदार व्यक्ति ही अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकता है.
- लेखक समाज की आत्मा के प्रहरी हैं.
- प्रश्न करते रहिये और उनके उत्तर खोजते रहिये...समय आने पर उत्तर मिलेंगे ही;
और समस्याओं का समाधान भी होगा .
104 पेज का ये शब्द संचयन दो रंगों में बहुत सादा लेकिन सुरूचिपूर्ण तरीक़े से राजपाल एण्ड संस ने प्रकाशित किया है. सारी सूक्तियाँ मन को छूती हैं. प्रत्येक पृष्ठ पर वाँटर मार्क के रूप में कलात्मक चित्र भी हैं जो इन सूक्तियों को पढ़ते वक़्त आँखों को सुकून देते हैं. हिन्दी के प्रसार और प्रचार में भी डाँ.कलाम का यह शब्द संचय महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा क्योंकि छोटी छोटी पंक्तियों में रचे गए ये अग्नि मंत्र वाक़ई प्रेरणास्पद तो हैं ही साथ अंग्रेज़ीदाँ युवा पीढ़ी हमारी राष्ट्र-भाषा की ओर भी ले जाते हैं.हिन्दी मे निश्चित ही ऐसे प्रकाशनों की आवश्यकता है जो उपदेशात्मक न होते हुए आपसे बतियाते हुए नज़र आएँ और पढ़ते ही दिन भर आपके मन-मस्तिष्क में स्पंदित होते रहें.
Wednesday, August 15, 2007
दो अलग बातें हैं

किसी व्यक्ति को आदर देना और उसके लिये मन में आदर होना.....दो अलग बातें हैं.
संस्कारों की दुहाई देना और वक़्त आने पर उस पर चलना उतरना.....दो अलग बातें हैं
मीठे शब्द बोलना और वैसा आचरण करना.....दो अलग बातें हैं
किसी से सहमत होने का अभिनय करना और उसकी बात का अनुसरण करना.....दो अलग बातें हैं.
क्रोध पी जाता हूं मै ऐसा कहना और वाक़ई क्रोध पी जाना.....दो अलग बातें हैं.
महान विभूतियों का जीवन-चरित पढ़ना और वैसा बनना.....दो अलग बातें हैं
उदारता की बातें करना और उदार होना.....दो अलग बातें हैं
प्रगतिशीलता पर चलने सीख देना और प्रगतशील होना.....दो अलग बातें हैं.
Wednesday, August 8, 2007
छोटी छोटी बातों में ही तो छुपा है जीवन सार
-हमारी सबसे बड़ी शान गिरने में नहीं ...हर बार गिर कर उठ खड़े हो जाने में हैं.
-मधुर शब्द शहद के समान है .आत्मा के के लिये मधुर और देह के लिये स्वास्थ्यवर्धक.
-बुध्दि परीक्षण करने बैठती है किन्तु विवेक निरीक्षण में ही खु़श रहता है.
-जिन्हें सबसे कम कहना होता है..वही सबसे ज़्यादा बोलते हैं.
-विरोधी ही सबसे बडा़ पथ-प्रदर्शक और अंतत: शुभ-चिंतक साबित होता है.
-अतीत पर क्रोध और भविष्य के भय में पूरा जीवन बीत जाता है
जबकि बीतना चाहिये वर्तमान के लिये.
-दूसरों की अनुकंपा पर जीने वाला मनुष्य भिखारी के समान नहीं..भिखारी ही है.
-विस्तार में हाहाकार है...समेटने में सार है.
-सहो और बचो.
-प्रसन्न रहना चाहते हैं ? दूसरों से अपेक्षा मत करो...दूसरों की अपेक्षा को पूरा करो.
-उस निराकारी ईश्वर को दिन में एक बार अवश्य धन्यवाद दो जिसने आज का दिन सुदिन बना दिया..हमें स्वस्थ रखा..मानसिक रूप से चैतन्य रखा और किसी के लिये मन में शुभ-विचार लाने के लिये प्रेरित किया.इति शुभम.
-मधुर शब्द शहद के समान है .आत्मा के के लिये मधुर और देह के लिये स्वास्थ्यवर्धक.
-बुध्दि परीक्षण करने बैठती है किन्तु विवेक निरीक्षण में ही खु़श रहता है.
-जिन्हें सबसे कम कहना होता है..वही सबसे ज़्यादा बोलते हैं.
-विरोधी ही सबसे बडा़ पथ-प्रदर्शक और अंतत: शुभ-चिंतक साबित होता है.
-अतीत पर क्रोध और भविष्य के भय में पूरा जीवन बीत जाता है
जबकि बीतना चाहिये वर्तमान के लिये.
-दूसरों की अनुकंपा पर जीने वाला मनुष्य भिखारी के समान नहीं..भिखारी ही है.
-विस्तार में हाहाकार है...समेटने में सार है.
-सहो और बचो.
-प्रसन्न रहना चाहते हैं ? दूसरों से अपेक्षा मत करो...दूसरों की अपेक्षा को पूरा करो.
-उस निराकारी ईश्वर को दिन में एक बार अवश्य धन्यवाद दो जिसने आज का दिन सुदिन बना दिया..हमें स्वस्थ रखा..मानसिक रूप से चैतन्य रखा और किसी के लिये मन में शुभ-विचार लाने के लिये प्रेरित किया.इति शुभम.
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